सोनीपत की बेटियों ने एशियाई खेलों में देश का मान बढ़ाया है. भारतीय महिला हॉकी टीम में सोनीपत की 4 खिलाड़ी ज्योति रुमावत, नेहा गोयल, साक्षी राणा और शिल्पी डबास शामिल रहीं. भारत की स्वर्णिम जीत में इन खिलाड़ियों ने अहम भूमिका निभाई. इन्हीं में से एक ज्योति रुमावत की कहानी संघर्ष, मेहनत और हौसले की मिसाल है. जिस बेटी के हॉकी खेलने के लिए कभी जूते खरीदना भी मुश्किल था, आज उसी बेटी ने देश के लिए गोल्ड जीतकर परिवार का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है.
ज्योति ने छठी कक्षा में हॉकी खेलना शुरू किया था. उस समय परिवार पहले से ही मुश्किल दौर से गुजर रहा था. पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ गई थीं, लेकिन ज्योति ने हॉकी को अपना सपना बना लिया. आर्थिक परेशानी के बावजूद उसने खेलना जारी रखा और धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई.
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मां ने घरों में काम कर बेटी का सपना बचाया
ज्योति के परिवार के लिए हॉकी का सफर आसान नहीं था. कई बार हॉकी की फीस और जूतों के लिए पैसे जुटाना मुश्किल हो जाता था. ऐसे वक्त में ज्योति की मां ने घरों में काम करके बेटी के सपने को जिंदा रखा. मां की मेहनत और बेटी के हौसले ने मिलकर उस सपने को आगे बढ़ाया, जिसे आज देश की जीत के साथ एक बड़ी कामयाबी मिली है.
दादी की आंखों में खुशी के आंसू
ज्योति की जीत के बाद परिवार में खुशी का माहौल है. दादी मूर्ति देवी के लिए यह सिर्फ पोती की जीत नहीं है, बल्कि उन मुश्किल दिनों का जवाब भी है, जब परिवार ने ज्योति को हॉकी खेलते और आगे बढ़ते देखा था. पोती की कामयाबी पर दादी की आंखों में खुशी के आंसू हैं और उन्हें ज्योति की मेहनत पर गर्व है.
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एशियाई खेलों के लिए रवाना होने से पहले ज्योति ने अपने भाई प्रवीण से कहा था कि वह इस बार कुछ बहुत अच्छा करने जा रही है. अब बहन ने स्वर्ण पदक जीतकर अपनी कही बात सच कर दिखाई है. ज्योति की इस कामयाबी ने परिवार को खुशी के साथ यह भरोसा भी दिया है कि मुश्किल हालात सपनों के रास्ते में हमेशा के लिए दीवार नहीं बन सकते.