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कोरोना में बेटे को खोने के बाद मां को उम्मीद थी कि LIC से इंश्योरेंस की रकम मिल जाएगी, लेकिन कंपनी ने क्लेम ही ठुकरा दिया. LIC ने पुरानी बीमारी छिपाने की बात कही, मगर कोर्ट में इसका ठोस सबूत नहीं दे पाई. आखिरकार कोर्ट ने मां के हक में फैसला सुनाते हुए कुल 2.25 लाख रुपये देने का आदेश दिया.

क्या है पूरा मामला 

महिला के बेटे का LIC में 2 लाख रुपये का इंश्योरेंस था और इसकी पॉलिसी 15 नवंबर 2020 से शुरू हुई थी. मई 2021 में कोरोना के दौरान बेटे को सांस लेने में परेशानी और सीने में भारीपन हुई. उसे इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया, लेकिन हालत बिगड़ने पर दूसरे अस्पताल ले जाते समय 8 मई 2021 को उसकी मौत हो गई.

बेटे की मौत के बाद मां ने LIC को इसकी जानकारी दी और पॉलिसी से जुड़े सभी डॉक्यूमेंट्स जमा कर क्लेम मांगा. लेकिन, कंपनी ने नवंबर 2021 में क्लेम खारिज कर दिया. LIC का कहना था कि बेटा बचपन से सांस से जुड़ी परेशानी से जूझ रहा था और इंश्योरेंस फॉर्म भरते समय इस पुरानी बीमारी की जानकारी नहीं दी गई थी.

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कोर्ट ने क्या कहा?

मामला कंज्यूमर कमीशन पहुंचने के बाद कोर्ट ने LIC के दावे को मंजूर नहीं किया. कोर्ट ने कहा कि कंपनी ऐसा कोई ठोस मेडिकल सबूत पेश नहीं कर पाई, जिससे ये साबित हो सके कि बेटे को बचपन से सांस लेने में दिक्कत थी. इसलिए ये नहीं माना जा सकता कि इंश्योरेंस फॉर्म में पुरानी बीमारी की जानकारी जानबूझकर छिपाई गई थी. कोर्ट ने LIC को 2 लाख रुपये का इंश्योरेंस क्लेम देने का कहा. इसके अलावा महिला को हुई परेशानी के लिए 20 हजार रुपये मुआवजा और 5 हजार रुपये मुकदमे का खर्च भी देने को कहा गया. इस तरह मां को कुल 2.25 लाख रुपये मिलेंगे.

बीमा क्लेम रिजेक्ट हो तो क्या करें

अगर बीमा कंपनी आपका क्लेम खारिज करती है, तो सबसे पहले कंपनी से क्लेम रिजेक्शन की वजह लिखित में मांगें. पॉलिसी और सभी जरूरी डॉक्यूमेंट्स संभालकर रखें. अगर आपको लगता है कि क्लेम गलत तरीके से रिजेक्ट हुआ है, तो इंश्योरेंस कंपनी की शिकायत प्रोसेस के बाद कंज्यूमर कोर्ट में शिकायत की जा सकती है.

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