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सुबह से शाम तक सड़क पर रहना, ट्रैफिक के बीच लगातार बाइक चलाना, गर्मी और बारिश की परवाह किए बिना ऑर्डर पहुंचाना और समय पर डिलीवरी का दबाव.. देश के लाखों गिग वर्कर्स की रोज की जिंदगी कुछ ऐसी ही है. ऐप के जरिए मिलने वाले इस काम ने कमाई का रास्ता तो खोला है, लेकिन काम के दौरान सुरक्षा और स्वास्थ्य को लेकर एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया है.

एक नए सर्वे में सामने आया है कि 62.2 फीसदी प्लेटफॉर्म वर्कर्स के पास हेल्थ इंश्योरेंस नहीं है. यानी बीमारी या इलाज की जरूरत पड़ने पर 10 में से करीब 6 वर्कर्स के पास मेडिकल खर्च को संभालने के लिए इंश्योरेंस का सहारा नहीं है.

सर्वे के लिए कितने वर्कर्स से हुई बात?
सर्वे जनपहल की ओर से किया गया है. इसमें देश के 10 शहरों के 1,000 प्लेटफॉर्म वर्कर्स को शामिल किया गया है. सर्वे में डिलीवरी, कैब और दूसरे ऐप पर काम करने वाले लोगों से उनकी कामकाजी परिस्थितियों, स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर जानकारी ली गई.

रिपोर्ट बताती है कि इन वर्कर्स को लगातार काम करने के साथ- साथ सड़क हादसों, खराब मौसम और लगातार काम के दबाव जैसे जोखिमों का भी सामना करना पड़ता है.

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हादसा हुआ तो कौन जिम्मेदार?

हेल्थ इंश्योरेंस की कमी के साथ दुर्घटना बीमा को लेकर भी मामला सही नहीं है. सर्वे के मुताबिक 44.2 फीसदी प्लेटफॉर्म वर्कर्स के पास दुर्घटना बीमा नहीं था. यानी अगर सड़क पर काम करते हुए कोई हादसा हो जाए तो वर्कर्स के पास आर्थिक मदद का सुरक्षा कवच तक नहीं है.

जिन वर्कर्स ने दुर्घटना बीमा का क्लेम किया है, उनमें 80 फीसदी से ज्यादा ने क्लेम के प्रोसेस को काफी ज्यादा मुश्किल बताया है. इसका मतलब ये है कि बीमा होने के बाद भी जरूरत के समय इसका इस्तेमाल कर पाना हर वर्कर के लिए आसान नहीं है.

लंबे समय तक काम करने का दबाव

गिग वर्कर्स के लिए कमाई और काम के घंटे एक-दूसरे से जुड़े होते हैं. ज्यादा समय काम करने का मतलब कई मामलों में ज्यादा कमाई का मौका होता है. लेकिन लंबे समय तक सड़क पर रहने से थकान और दुर्घटना का जोखिम भी बढ़ जाता है.

डिलीवरी और कैब जैसे कामों में समय पर पहुंचने का दबाव भी रहता है. ऐसे में मौसम, ट्रैफिक और सड़क के हालात वर्कर्स के खतरा पैदा करते हैं.

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