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पंजाब विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर जीत और हार का फैसला बेहद कम वोटों से होता है. 2022 के चुनाव में जालंधर सेंट्रल सीट पर आम आदमी पार्टी के रमन अरोड़ा ने कांग्रेस के राजिंदर बेरी को सिर्फ 247 वोटों से हराया था. वहीं, डेरा बाबा नानक में कांग्रेस के सुखजिंदर सिंह रंधावा ने 466 वोटों से जीत दर्ज की थी. ऐसे नतीजे बताते हैं कि चुनाव में एक-एक वोट कितना अहम हो सकता है. अब 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए इन सीटों पर राजनीतिक दलों की नजर रहेगी. जहां कुछ सीटों पर उम्मीदवारों ने बड़े अंतर से जीत हासिल की थी, वहीं कई सीटों पर कांटे की टक्कर देखने को मिली थी.

पंजाब विधानसभा चुनाव 2022 में जालंधर सेंट्रल सीट सबसे करीबी मुकाबलों में शामिल रही थी. यहां आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार रमन अरोड़ा ने कांग्रेस के राजिंदर बेरी को महज 247 वोटों से हराया था. दोनों उम्मीदवारों के बीच मुकाबला इतना कड़ा था कि कुछ सौ वोटों का अंतर नतीजे को बदल सकता था.

इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार मनोरंजन कालिया भी मैदान में थे. उन्हें करीब 26.50 प्रतिशत वोट मिले थे. ऐसे में यहां कई दलों के बीच वोटों का बंटवारा भी चुनावी नतीजे को समझने का अहम पहलू रहा.

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2027 के चुनाव में जालंधर सेंट्रल पर मुकाबला फिर दिलचस्प हो सकता है. आम आदमी पार्टी के सामने अपनी जीत बरकरार रखने की चुनौती होगी, जबकि कांग्रेस और दूसरे दल इस सीट पर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश करेंगे.

डेरा बाबा नानक में 466 वोटों से जीते थे सुखजिंदर सिंह रंधावा

डेरा बाबा नानक सीट पर भी 2022 के विधानसभा चुनाव में कांटे की टक्कर देखने को मिली थी. कांग्रेस के सुखजिंदर सिंह रंधावा ने शिरोमणि अकाली दल के उम्मीदवार रविकरण सिंह काहलों को सिर्फ 466 वोटों से हराया था.

इस नतीजे ने दिखाया कि पंजाब में आम आदमी पार्टी की बड़ी चुनावी सफलता के बावजूद कांग्रेस कुछ क्षेत्रों में अपना प्रभाव बनाए रखने में कामयाब रही थी. डेरा बाबा नानक में जीत का अंतर बेहद कम होने के कारण आने वाले चुनाव में स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार की छवि और पार्टी के संगठन की भूमिका अहम हो सकती है.

2027 के चुनाव में कांग्रेस इस सीट पर अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश करेगी, जबकि विरोधी दल जीत हासिल करने के लिए अपनी रणनीति तैयार करेंगे.

दीनानगर, भोआ और गिद्दड़बाहा में भी कड़ा मुकाबला

पंजाब की कुछ दूसरी सीटों पर भी जीत का अंतर बहुत ज्यादा नहीं था. दीनानगर में कांग्रेस की अरुणा चौधरी ने आम आदमी पार्टी के शमशेर सिंह को 1,131 वोटों से हराया था.

वहीं, भोआ सीट पर आम आदमी पार्टी के लाल चंद ने कांग्रेस के जोगिंदर पाल को 1,204 वोटों से मात दी थी. गिद्दड़बाहा में कांग्रेस के अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने शिरोमणि अकाली दल के हरदीप सिंह डिंपी ढिल्लों को 1,349 वोटों से हराया था.

इन तीनों सीटों के नतीजे बताते हैं कि मतदाताओं के रुख में थोड़ा बदलाव भी चुनावी मुकाबले को प्रभावित कर सकता है. 2027 में राजनीतिक दलों के सामने इन क्षेत्रों में अपना समर्थन बढ़ाने की चुनौती होगी.

खास बात यह है कि करीबी मुकाबले वाली सीटों पर सिर्फ राज्यव्यापी चुनावी माहौल ही नतीजा तय नहीं करता. स्थानीय नेताओं का प्रभाव, क्षेत्र की समस्याएं, उम्मीदवार की लोकप्रियता और मतदाताओं तक पार्टी की पहुंच भी अहम भूमिका निभाती है.

2022 में सबसे बड़े अंतर से कहां मिली थी जीत?

पंजाब विधानसभा चुनाव 2022 में जहां कुछ सीटों पर जीत का अंतर बहुत कम था, वहीं कई क्षेत्रों में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों ने बड़ी जीत दर्ज की थी. सुनाम सीट पर आम आदमी पार्टी के अमन अरोड़ा ने कांग्रेस के जसविंदर सिंह धीमान को 75,277 वोटों से हराया था. यह चुनाव में सबसे बड़े जीत के अंतर वाले मुकाबलों में शामिल था.

बठिंडा अर्बन सीट पर आम आदमी पार्टी के जरूप सिंह गिल ने कांग्रेस के मनप्रीत सिंह बादल को 63,581 वोटों से मात दी थी. इसी तरह मानसा सीट पर आम आदमी पार्टी के डॉ. विजय सिंगला ने कांग्रेस के उम्मीदवार शुभदीप सिंह सिद्धू मूसेवाला को 63,323 वोटों से हराया था.

धूरी सीट पर भी आम आदमी पार्टी को बड़ी जीत मिली थी. पार्टी के भगवंत मान ने कांग्रेस के दलवीर सिंह गोल्डी को 58,206 वोटों से हराया था. इसके अलावा गिल, पटियाला ग्रामीण, नाभा, बुढलाडा, शुतराना और दिरबा जैसी सीटों पर भी आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों ने बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी.

इन नतीजों से साफ था कि 2022 के चुनाव में आम आदमी पार्टी को कई क्षेत्रों में मजबूत समर्थन मिला. हालांकि, कम अंतर से जीती गई सीटों के नतीजे यह भी बताते हैं कि पूरे राज्य में एक जैसा चुनावी माहौल नहीं था.

पट्टी और जगराांव में भी पहले दिख चुकी है कांटे की टक्कर

पंजाब में करीबी मुकाबलों का इतिहास पुराना है. वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर उम्मीदवारों के बीच बेहद कम वोटों का अंतर रहा था.

फिल्लौर सीट पर अविनाश चंद्र ने कांग्रेस के सतवीर सिंह को सिर्फ 31 वोटों से हराया था. यह बेहद कम अंतर से मिली जीत का उदाहरण है. वहीं, दसूहा सीट पर वर्ष 1992 के चुनाव में कांग्रेस के रमेश चंद्र ने महंत राम प्रकाश को महज 53 वोटों से मात दी थी.

2012 के चुनाव में फिरोजपुर ग्रामीण सीट पर शिरोमणि अकाली दल के जोगिंदर सिंह ने कांग्रेस की सरकार कोर को 162 वोटों से हराया था. इसी चुनाव में जगराांव सीट पर शिरोमणि अकाली दल के शिव राम कल्लेर ने कांग्रेस के ईश्वर सिंह को 206 वोटों से शिकस्त दी थी.

पट्टी सीट पर भी मुकाबला बेहद करीबी रहा था. यहां शिरोमणि अकाली दल के आदेश प्रताप सिंह कैरों ने कांग्रेस के हरमिंदर सिंह गिल को सिर्फ 59 वोटों से हराया था. बाद के चुनाव में इस सीट पर आम आदमी पार्टी के लालजीत सिंह भुल्लर ने कैरों को शिकस्त दी.

ये उदाहरण बताते हैं कि पंजाब की राजनीति में कई बार बेहद कम अंतर से मिली जीत अगले चुनाव में बदल भी सकती है. हालांकि, पुराने नतीजों के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि अगली बार किस पार्टी को जीत मिलेगी.

2027 में इन सीटों पर क्या होगी राजनीतिक दलों की रणनीति?

2027 के विधानसभा चुनाव में करीबी मुकाबले वाली सीटें राजनीतिक दलों के लिए खास अहमियत रख सकती हैं. आम आदमी पार्टी के लिए उन सीटों पर अपनी स्थिति मजबूत करना जरूरी होगा, जहां 2022 में जीत का अंतर कम था.

वहीं, कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल जैसे विपक्षी दल उन क्षेत्रों में वापसी की कोशिश कर सकते हैं, जहां वे पिछली बार थोड़े अंतर से हार गए थे. भारतीय जनता पार्टी भी उन सीटों पर अपना आधार बढ़ाने की कोशिश कर सकती है, जहां उसे पहले से कुछ समर्थन मिला था.

इन सीटों पर उम्मीदवारों का चयन भी काफी अहम होगा. पार्टी अगर किसी लोकप्रिय स्थानीय नेता को मैदान में उतारती है, तो मुकाबले की तस्वीर बदल सकती है. इसके अलावा सड़क, पानी, बिजली, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं.

चुनाव प्रचार के दौरान राजनीतिक दलों को बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने और मतदाताओं से लगातार संपर्क बनाए रखने पर भी ध्यान देना होगा. करीबी मुकाबले में मतदान प्रतिशत और अलग-अलग दलों के बीच वोटों का बंटवारा भी अहम साबित हो सकता है.

एक-एक वोट क्यों हो सकता है निर्णायक?

पंजाब के पिछले चुनावों के नतीजे बताते हैं कि बड़ी रैलियों और राज्यव्यापी चुनावी लहर के बीच भी स्थानीय स्तर पर मुकाबला बेहद करीबी हो सकता है. जालंधर सेंट्रल में 247 वोट और डेरा बाबा नानक में 466 वोटों का अंतर इसका उदाहरण है.

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हालांकि, 2027 में इन सीटों पर क्या नतीजे आएंगे, यह अभी कहना जल्दबाजी होगी. चुनाव से पहले राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं, नए उम्मीदवार मैदान में आ सकते हैं और मतदाताओं की प्राथमिकताएं भी बदल सकती हैं.

फिलहाल इतना जरूर है कि पंजाब विधानसभा चुनाव में कम अंतर से जीत और हार वाली सीटें राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण रहेंगी. इन क्षेत्रों में उम्मीदवार की लोकप्रियता, स्थानीय मुद्दों और संगठन की ताकत का असर नतीजों पर पड़ सकता है. यही वजह है कि 2027 के चुनाव में इन सीटों पर सभी प्रमुख दलों की नजर रहने की संभावना है.



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