फर्ज करिए कि हॉस्पिटल में जांच के दौरान किसी को कैंसर डायग्नोस हुआ। उसने सर्जरी करवा ली। बाद में पता चला कि उसे कैंसर था ही नहीं। कुछ वक्त पहले ऐसी ही एक घटना का जिक्र हॉलीवुड एक्ट्रेस लूसी लुइस ने किया था। 22 साल की उम्र में उनके ब्रेस्ट में एक गांठ मिली, जिसे कैंसर समझकर सर्जरी कर दी गई। बाद में पता चला कि वह कैंसरस गांठ नहीं थी। यह सब गलत डायग्नोसिस के कारण हुआ था। उस घटना के बाद से लूसी लोगों को जागरूक करने लगीं कि किसी भी गंभीर बीमारी में- इसलिए ‘फिजिकल हेल्थ’ में आज समझेंगे कि किसी मेडिकल डिसीजन से पहले सेकेंड ओपिनियन कितनी जरूरी है। साथ ही जानेंगे कि- एक्सपर्ट: डॉ. रोहित शर्मा, कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन, अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल, जयपुर सवाल- सेकेंड ओपिनियन क्या है? जवाब- सेकेंड ओपिनियन का मतलब है, किसी बीमारी के इलाज से पहले डॉक्टर की राय लेने के बाद, दूसरे डॉक्टर से भी उसी मामले पर सलाह लेना। आमतौर पर सेकेंड ओपिनियन तब ली जाती है, जब- सवाल- हर बड़े मेडिकल फैसले से पहले सेकेंड ओपिनियन लेना क्यों जरूरी है? जवाब- किसी भी बड़े मेडिकल डिसीजन से पहले सेकेंड ओपिनियन इसलिए जरूरी है, क्योंकि- सवाल- सेकेंड ओपिनियन न लेने से किस तरह के संभावित रिस्क हो सकते हैं? जवाब- इसके कारण कई रिस्क हो सकते हैं। डिटेल ग्राफिक में देखिए- सवाल- दुनिया और भारत में मिसडा
