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पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग का करीब साढ़े 4 साल का कार्यकाल अब खत्म हो गया है. वड़िंग ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है. इसके साथ ही पंजाब कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति का एक बड़ा अध्याय भी खत्म हो गया. लेकिन वड़िंग के इस्तीफे के साथ एक सवाल फिर चर्चा में है, आखिर राहुल गांधी को राजा वड़िंग पर इतना भरोसा क्यों था?

इस सवाल का जवाब सिर्फ दोनों नेताओं की राजनीतिक नजदीकी में नहीं मिलता. इसके पीछे करीब एक दशक पुराना संगठनात्मक रिश्ता, यूथ कांग्रेस का दौर, 2022 का पंजाब विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव का प्रदर्शन भी जुड़ा हुआ है.

यूथ कांग्रेस से शुरू हुई राहुल गांधी और वड़िंग की कहानी

राजा वड़िंग और राहुल गांधी का राजनीतिक जुड़ाव काफी पुराना है. वड़िंग ने अपने राजनीतिक सफर में यूथ कांग्रेस के जरिए अपनी पहचान बनाई. वह 2014 से 2018 तक इंडियन यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे. यूथ कांग्रेस के इस दौर में राहुल गांधी संगठन में युवा नेताओं को आगे बढ़ाने पर जोर दे रहे थे. वड़िंग भी इसी दौर में राहुल गांधी के भरोसेमंद युवा नेताओं में शामिल हुए.

राजा वडिंग के इस्तीफे तक कैसे पहुंची पंजाब कांग्रेस? जानें कब क्या हुआ

इससे पहले 2012 में वड़िंग को गिद्दड़बाहा विधानसभा सीट से कांग्रेस का टिकट मिला. उस समय पार्टी के अंदर उनके नाम को लेकर पूरी तरह सहमति नहीं थी. इसके बावजूद राहुल गांधी ने उनके समर्थन में प्रचार किया और वड़िंग चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे. यहीं से वड़िंग की राजनीति में राहुल गांधी के साथ उनका रिश्ता और मजबूत होता गया.

2022 में कांग्रेस को थी एक नए चेहरे की तलाश

पंजाब कांग्रेस के लिए 2022 का विधानसभा चुनाव बेहद खराब रहा. कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और 117 विधानसभा सीटों वाले पंजाब में पार्टी सिर्फ 18 सीटों पर सिमट गई. लेकिन कांग्रेस की परेशानी सिर्फ चुनावी हार तक सीमित नहीं थी. चुनाव से पहले ही पार्टी के अंदर नेतृत्व को लेकर काफी खींचतान हो चुकी थी.

कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री पद से हटे और बाद में कांग्रेस छोड़कर अलग पार्टी बनाई. इसके बाद उन्होंने बीजेपी का रुख किया. दूसरी तरफ नवजोत सिंह सिद्धू भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी से हट गए. ऐसे समय में कांग्रेस हाईकमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि पंजाब संगठन की कमान किसे दी जाए. यहीं राजा वड़िंग का नाम सामने आया.

अप्रैल 2022 में वड़िंग को पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया. उस समय उनकी सबसे बड़ी ताकत सिर्फ उनका युवा होना नहीं था. वह संगठन को समझने वाले नेता थे और हाईकमान के साथ उनका पुराना संपर्क भी था.

जब कई पुराने चेहरे कांग्रेस से दूर होते गए

वड़िंग के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद भी पंजाब कांग्रेस की मुश्किलें खत्म नहीं हुईं. पार्टी के कई बड़े नेता अलग-अलग कारणों से कांग्रेस से दूर होते गए. रवनीत सिंह बिट्टू इसका एक बड़ा उदाहरण रहे. कभी राहुल गांधी के करीबी नेताओं में गिने जाने वाले बिट्टू मार्च 2024 में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में चले गए. इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में लुधियाना सीट पर बिट्टू और राजा वड़िंग आमने-सामने थे.

यह मुकाबला इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि यहां सिर्फ दो नेताओं के बीच चुनावी लड़ाई नहीं थी. वड़िंग ने इसे राजनीतिक तौर पर कांग्रेस के साथ खड़े रहने और पार्टी छोड़ने वालों के बीच मुकाबले के रूप में पेश किया. आखिरकार वड़िंग ने बिट्टू को हरा दिया और लोकसभा पहुंच गए.

इस पूरे दौर में राहुल गांधी के सामने पंजाब में राजनीतिक तस्वीर बदलती जा रही थी. कई पुराने चेहरे पार्टी से बाहर जा रहे थे, जबकि वड़िंग संगठन की जिम्मेदारी संभालते हुए कांग्रेस के साथ बने हुए थे.

2024 का लोकसभा चुनाव बना वड़िंग के लिए बड़ा सहारा

अगर यह सवाल पूछा जाए कि 2022 के बाद राहुल गांधी और कांग्रेस हाईकमान का भरोसा वड़िंग पर क्यों बना रहा, तो 2024 का लोकसभा चुनाव इसकी एक बड़ी वजह दिखाई देती है. 2022 में 18 विधानसभा सीटों तक सिमटने वाली कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनाव में पंजाब की 13 सीटों में से 7 सीटें जीत लीं.

यह नतीजा कांग्रेस के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि पार्टी पंजाब में सत्ता से बाहर थी और आम आदमी पार्टी की सरकार राज्य में थी. वड़िंग खुद लुधियाना से मैदान में उतरे. उन्होंने बीजेपी के रवनीत सिंह बिट्टू को हराया और सांसद बने.

कांग्रेस के लिए यह सिर्फ वड़िंग की व्यक्तिगत जीत नहीं थी. प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर उनके नेतृत्व में पार्टी का लोकसभा प्रदर्शन भी उनके पक्ष में एक मजबूत राजनीतिक तर्क बन गया. इसी वजह से जब बाद में पंजाब कांग्रेस में उनके खिलाफ आवाजें उठीं तो उनके समर्थक 2024 के नतीजे को सामने रखते रहे.

पंजाब कांग्रेस में कम नहीं हुई गुटबाजी

वड़िंग के कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौती शायद यही रही कि चुनावी प्रदर्शन के बावजूद पंजाब कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान खत्म नहीं हो सकी. पार्टी के भीतर अलग-अलग नेताओं के अपने-अपने राजनीतिक आधार थे. पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी का भी पार्टी में मजबूत प्रभाव रहा.

2026 में वड़िंग और चन्नी के बीच नेतृत्व को लेकर मतभेद ज्यादा साफ दिखाई देने लगे. चन्नी और उनके समर्थकों की ओर से प्रदेश अध्यक्ष पद पर बदलाव की मांग उठी. दूसरी तरफ वड़िंग के समर्थक उनके कार्यकाल और 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन को उनके पक्ष में रखते रहे.

कांग्रेस हाईकमान ने भी कुछ समय तक दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की. जुलाई में वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष के पद पर बनाए रखा गया, जबकि चन्नी को चुनाव अभियान समिति की जिम्मेदारी दी गई. लेकिन इससे भी अंदरूनी विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ.

मनीष तिवारी की टिप्पणी ने भी बढ़ाई चर्चा

इसी राजनीतिक माहौल के बीच कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी की एक टिप्पणी भी चर्चा में रही. तिवारी ने संगठन से जुड़े फैसलों पर सवाल उठाते हुए यह तंज किया था कि क्या किसी पद के लिए योग्य होना ही अब अयोग्यता का पैमाना बन गया है.

हालांकि, मनीष तिवारी की भूमिका को सीधे चन्नी खेमे से जोड़ना सही नहीं होगा. उस समय पंजाब कांग्रेस में असंतोष सिर्फ दो नेताओं के बीच का मामला नहीं था. संगठन के भीतर नेतृत्व और भविष्य की रणनीति को लेकर कई स्तरों पर सवाल उठ रहे थे.

सचिन पायलट की एंट्री और बदला समीकरण

सितंबर 2026 में कांग्रेस ने पंजाब के प्रभारी की जिम्मेदारी में बदलाव किया. भूपेश बघेल की जगह सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी बनाया गया. इसके बाद पायलट ने पंजाब कांग्रेस के अलग-अलग नेताओं और गुटों से बातचीत की. उन्होंने संगठन की स्थिति को समझने और नेताओं के बीच मतभेदों को लेकर फीडबैक लेने की कोशिश की.

इसके बाद कांग्रेस हाईकमान ने पंजाब संगठन में बदलाव का फैसला किया. 30 सितंबर 2026 को राजा वड़िंग के इस्तीफे की खबर सामने आई. यानी जिस नेता पर राहुल गांधी ने 2022 के मुश्किल दौर में भरोसा जताया था, करीब साढ़े चार साल बाद उसी नेता को पंजाब कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के बीच प्रदेश अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा.

तो आखिर राहुल गांधी को वड़िंग पर भरोसा क्यों था?

पहली वजह थी यूथ कांग्रेस से बना पुराना राजनीतिक रिश्ता. वड़िंग ने राहुल गांधी के दौर में यूथ कांग्रेस में काम किया और प्रदेश अध्यक्ष तक पहुंचे. दूसरी वजह थी संगठन संभालने की उनकी क्षमता. 2022 में कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने और पार्टी के अंदर बड़े नेताओं के अलग होने के बाद वड़िंग को संगठन की जिम्मेदारी दी गई.

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तीसरी वजह थी 2024 का लोकसभा चुनाव. कांग्रेस ने पंजाब में 13 में से 7 सीटें जीतीं और वड़िंग खुद लुधियाना से जीतकर लोकसभा पहुंचे. चौथी वजह यह भी थी कि जब पंजाब कांग्रेस में कई पुराने और बड़े चेहरे अलग-अलग कारणों से पार्टी से दूर हो रहे थे, तब वड़िंग लगातार कांग्रेस संगठन के साथ खड़े रहे.

राहुल गांधी के साथ वड़िंग का राजनीतिक रिश्ता यूथ कांग्रेस से शुरू हुआ था. 2022 में राहुल गांधी के भरोसे ने उन्हें पंजाब कांग्रेस की कमान तक पहुंचाया. 2024 में लोकसभा चुनाव का प्रदर्शन उनके पक्ष में गया. लेकिन 2026 में पंजाब कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति और बदलते संगठनात्मक समीकरणों ने तस्वीर बदल दी.



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