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रेशम की खेती यानी सेरीकल्चर में किसान शहतूत के पौधे उगाकर उनके पत्तों से रेशम के कीड़ों को पालते हैं. ये कीड़े पत्तियां खाकर कोकून बनाते हैं और इन्हीं कोकून से रेशम तैयार किया जाता है. ऐसे में आइए जानते हैं कि किसान रेशम की खेती की शुरुआत कैसे कर सकते हैं और इससे कितनी कमाई होती है. 

रेशम की खेती शुरू करने के लिए सबसे पहले शहतूत यानी मलबरी के पौधे लगाए जाते हैं. इसके पत्ते रेशम के कीड़ों का मुख्य भोजन होते हैं. सेंट्रल सिल्क बोर्ड के अनुसार, शहतूत की अलग-अलग वैरायटीज को मिट्टी और मौसम के हिसाब से लगाया जाता है. उदाहरण के लिए वी1 वैरायटी अच्छी बढ़वार और पत्तियों की ज्यादा पैदावार के लिए जानी जाती है. सिंचाई और सही देखभाल के साथ इससे अच्छी लीफ प्रोडक्शन मिल सकती है. किसान को खेत में पानी की सही व्यवस्था रखनी चाहिए. पौधों के बीच उचित दूरी, समय पर सिंचाई, खाद और खरपतवार की सफाई पर ध्यान देना जरूरी है. शहतूत की पत्तियों की क्वालिटी अच्छी रहेगी तो सिल्कवर्म रियरिंग में भी बेहतर परिणाम मिलने की संभावना रहती है.

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पत्तियों से ऐसे पाले जाते हैं रेशम के कीड़े

शहतूत के पौधे तैयार होने के बाद रेशम के अंडों से निकले कीड़ों को पत्तियां खिलाई जाती हैं. इन्हें साफ और हवादार जगह पर रखा जाता है. कीड़ों की उम्र बढ़ने के साथ उन्हें ज्यादा पत्तियों की जरूरत होती है. इस दौरान सफाई और टेम्परेचर का ध्यान रखना बहुत जरूरी है.सेंट्रल सिल्क बोर्ड की जानकारी के अनुसार रियरिंग हाउस में अच्छी हवा का आना-जाना जरूरी है. कीड़ों को पर्याप्त जगह देने के साथ नमी को नियंत्रित रखना भी जरूरी होता है. जब कीड़े पूरी तरह तैयार हो जाते हैं तो उन्हें माउंटेज पर रखा जाता है, जहां वे कोकून बनाते हैं. आमतौर पर कोकून बनने के कुछ दिनों बाद हार्वेस्टिंग की जाती है. किसान को बीमार कीड़ों को अलग रखना चाहिए और रियरिंग हाउस की सफाई नियमित रूप से करनी चाहिए. इससे बीमारी फैलने का खतरा कम होता है और कोकून की क्वालिटी बेहतर रहती है.

कितनी कमाई होती है रेशम की खेती से ?

रेशम की खेती से होने वाली कमाई एक जैसी नहीं रहती. इसमें जमीन का आकार, शहतूत की पैदावार, सिल्कवर्म की संख्या, कोकून का उत्पादन और बाजार में मिलने वाली कीमत का बड़ा असर होता है. सेंट्रल सिल्क बोर्ड के एक सरकारी दस्तावेज में मध्य प्रदेश के एक किसान का उदाहरण दिया गया है, जिसने एक एकड़ मलबरी प्लांटेशन से 700 डीएफएलएस के पालन में 355 किलो से ज्यादा क्वालिटी कोकून्स का उत्पादन किया और लगभग 1 लाख रुपये सालाना आय दर्ज की. इसी तरह दूसरे राज्यों के कुछ किसानों ने ज्यादा क्षेत्र और कई क्रॉप साइकिल्स के जरिए इससे काफी अधिक आमदनी दर्ज की है.कई जगह किसानों को मलबरी प्लांटेशन, रियरिंग शेड, इक्विपमेंट और दूसरी जरूरतों के लिए सरकारी योजनाओं के तहत सहायता भी मिलती है. 

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