पंजाब की राजनीति की बात हो और मालवा का जिक्र न हो, ऐसा मुश्किल है. लंबे समय तक राज्य की सत्ता की दिशा तय करने में मालवा की बड़ी भूमिका रही है. इस इलाके ने पंजाब को ऐसे कई मुख्यमंत्री दिए, जिनका नाम प्रदेश की राजनीति में आज भी बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है. लेकिन वक्त बदला तो राजनीतिक तस्वीर भी बदल गई. जिन परिवारों के इशारे पर कभी पंजाब की सियासत करवट लेती थी, अब उन्हीं घरानों के सामने अपनी राजनीतिक जमीन बचाए रखने की चुनौती है.
मालवा की धरती से प्रकाश सिंह बादल, सुरजीत सिंह बरनाला, बेअंत सिंह, हरचरण सिंह बराड़, कैप्टन अमरिंदर सिंह और बीबी राजिंदर कौर भट्टल जैसे बड़े नेता निकले. इन नेताओं ने अलग-अलग दौर में पंजाब की राजनीति को प्रभावित किया और मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे.
लेकिन इन नेताओं के दौर के मुकाबले आज राजनीतिक समीकरण काफी बदल चुके हैं. नई पार्टियों का उभार, नए चेहरे और मतदाताओं की बदलती पसंद ने पुराने राजनीतिक परिवारों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है.
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बादल परिवार के सामने विरासत को मजबूत रखने की चुनौती
प्रकाश सिंह बादल पंजाब के 5 बार मुख्यमंत्री रहे. हालांकि 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्हें अपनी पारंपरिक लंबी सीट पर हार का सामना करना पड़ा. बाद में उनके निधन के बाद सुखबीर सिंह बादल और हरसिमरत कौर बादल परिवार और शिरोमणि अकाली दल की राजनीतिक विरासत को संभाल रहे हैं. अब चुनौती सिर्फ विरासत को आगे बढ़ाने की नहीं, बल्कि बदलते पंजाब में अकाली दल के पुराने प्रभाव को दोबारा मजबूत करने की भी है.
सुरजीत सिंह बरनाला अपनी साफ-सुथरी राजनीति और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए जाने जाते रहे. उनके परिवार की अगली पीढ़ी भी राजनीति में सक्रिय रही है. उनके बेटे गगनजीत सिंह बरनाला और पोते परिवार की राजनीतिक पहचान को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं.
हालांकि आज की राजनीति में बरनाला परिवार का प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा. ऐसे में परिवार के सामने अपनी जगह दोबारा बनाने की बड़ी चुनौती है.
बेअंत सिंह के परिवार में अलग-अलग राजनीतिक रास्ते
बेअंत सिंह ने पंजाब में उग्रवाद के दौर के बाद शांति बहाली के समय मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाली थी. उनकी राजनीतिक विरासत को उनके परिवार के सदस्य आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन अलग-अलग राजनीतिक दलों के जरिए.
उनके पोते रवनीत सिंह बिट्टू भाजपा में हैं, जबकि गुरकीरत सिंह कोटली कांग्रेस से जुड़े रहे हैं. दोनों अपने-अपने राजनीतिक मंच से परिवार की पहचान को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.
अमरिंदर परिवार भी तलाश रहा नया सियासी आधार
कैप्टन अमरिंदर सिंह पंजाब के दो बार मुख्यमंत्री रहे. 2022 में पटियाला से चुनाव हारने के बाद उन्होंने भाजपा का रुख किया और अब इसी मंच के जरिए पंजाब की राजनीति में अपनी भूमिका तलाश रहे हैं.
उनकी पत्नी परनीत कौर और बेटी जयइंदर कौर भी राजनीति में सक्रिय हैं. ऐसे में परिवार की राजनीतिक विरासत को भाजपा के जरिए नई दिशा देने की कोशिश नजर आती है.
भट्टल और बराड़ परिवार की भी यही कहानी
पंजाब की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने वाली बीबी राजिंदर कौर भट्टल भी अब उस दौर में हैं, जब उनका पारंपरिक राजनीतिक प्रभाव पहले की तुलना में कमजोर हुआ है. 2017 और 2022 में चुनावी हार के बावजूद वे कांग्रेस में सक्रिय बनी हुई हैं और अपनी राजनीतिक पहचान बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं.
वहीं, हरचरण सिंह बराड़ के परिवार में उनकी बहू करण कौर बराड़ ने राजनीति में अपनी मौजूदगी बनाए रखी है. पूर्व विधायक करण कौर बराड़ के सामने भी परिवार की सियासी जमीन को संभालने की चुनौती है.
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भगवंत मान के उभार ने बदली मालवा की तस्वीर
इन पुराने राजनीतिक घरानों के बीच मालवा ने एक बिल्कुल नया चेहरा भी पंजाब को दिया. धुरी से आने वाले भगवंत मान आम आदमी पार्टी की लहर के साथ मुख्यमंत्री बने. उनका उभार इस बात का संकेत माना गया कि पंजाब का मतदाता अब केवल पुराने राजनीतिक परिवारों पर निर्भर नहीं रहना चाहता.
राजनीतिक जानकारों की नजर अब 2027 के विधानसभा चुनाव पर है. सवाल यही है कि मालवा के पुराने राजनीतिक घराने अपनी खोई हुई जमीन वापस हासिल कर पाएंगे या नए चेहरे और नए राजनीतिक समीकरण उन्हें और पीछे छोड़ देंगे. इसका जवाब आने वाला चुनाव ही देगा.