[wpcode id="23"]
BREAKING India Latest News | World News | Sports | Business | Entertainment | Technology | Weather Updates | Live News 24x7


E20 पेट्रोल पर देश भर में बहस तेज है. मंत्रालय से लेकर ऑटो इंडस्ट्री तक E20 का बचाव करते हुए कह रहे हैं कि फॉर्मूला-1 F1 जैसी रेसिंग कारों में भी तो इथेनॉल इस्तेमाल होता है, जिससे गाड़ी की परफॉर्मेंस बढ़ती है. हालांकि, सवाल ये भी उठ रहे है कि क्या रोज घर से दफ्तर जाने वाली आपकी हैचबैक या सेडान की तुलना रेस ट्रैक पर 300 किमी/घंटा की रफ्तार से दौड़ने वाली कार से की जा सकती है? आइए इस पूरे मुद्दे को एकदम आसान और विस्तार से समझते हैं. 

पहले यह समझिए कि विवाद शुरू कहां से हुआ?

सरकार ने शुरुआत में तय किया था कि भारत के पेट्रोल पंपों पर 2030 तक E20 पेट्रोल लाया जाएगा, लेकिन फिर इस लक्ष्य को खींचकर पूरे 5 साल पहले यानी 2025-26 कर दिया गया. नतीजा यह हुआ कि 1 अप्रैल 2026 से पूरे देश में आम पेट्रोल पंपों पर सिर्फ और सिर्फ E20 पेट्रोल ही बेस फ्यूल बन गया है. बिना एथेनॉल वाला सादा पेट्रोल अब केवल कुछ ‘प्रीमियम’ और महंगे विकल्पों में ही मिलता है.

विवाद की जड़ यही है कि देश की सड़कों पर करोड़ों पुरानी गाड़ियां चल रही हैं, जो E20 के लिए बनी ही नहीं थीं, लेकिन अब उनके मालिकों के पास यह नया पेट्रोल डलवाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है.

क्या रेसिंग कारों में भी पड़ता है एथेनॉल? 

सरकार का यह तर्क पूरी तरह से झूठ नहीं है, लेकिन यह बहुत हद तक पूरी तस्वीर नहीं दिखाता.  

  • F1 का सच: फॉर्मूला-1 कारों ने कभी 20% एथेनॉल इस्तेमाल नहीं किया. वे कई साल तक E10 पर ही काम करती रहीं, जिसे भारत अब बंद कर चुका है और अब तो F1 कारें एथेनॉल से आगे बढ़कर 100% ‘सिंथेटिक फ्यूल’ पर शिफ्ट हो गई हैं. 
  • इंजन की उम्र का जमीन-आसमान का फर्क: रेसिंग कार (जैसे NASCAR) का इंजन 800 से 1500 किलोमीटर चलने के बाद खोल दिया जाता है. उसके पार्ट्स बदल दिए जाते हैं, लेकिन आपकी कार से उम्मीद की जाती है कि वह बिना इंजन खुले 2 से 3 लाख किलोमीटर चले.
  • ईंधन रखने का तरीका: रेसिंग ट्रैक पर ईंधन ताजा बनाया जाता है और कुछ ही घंटों में इंजन में जला दिया जाता है. वहां ईंधन को महीनों तक टैंक में पड़े रहने की जरूरत नहीं होती. आम कारों में और पेट्रोल पंपों पर फ्यूल हफ्तों तक जमा रहता है.

असली समस्या’ इंजन नहीं, नमी (Moisture) है. इस पूरी बहस में इंजन से ज्यादा बड़ी समस्या भारत का मौसम और एथेनॉल की ‘पानी पीने की आदत’ है. तकनीकी भाषा में एथेनॉल ‘हाइग्रोस्कोपिक’ (Hygroscopic) होता है. मतलब यह हवा से नमी (पानी) सोखता है. सादे पेट्रोल में पानी नहीं घुलता, लेकिन जब उसमें 20% इथेनॉल मिलता है तो वह तेजी से नमी खींचने लगता है.

जब यह नमी एक हद से ज्यादा बढ़ जाती है (खासकर मॉनसून या तटीय इलाकों में) तो टैंक में पेट्रोल ऊपर तैरने लगता है और एथेनॉल-पानी का भारी मिश्रण नीचे बैठ जाता है. इसे फेज़ सेपरेशन कहते हैं. पेट्रोल पंप की मशीन नीचे से ही तेल खींचती है यानी आपकी गाड़ी में पानी और इथेनॉल का मिश्रण जा सकता है, जिससे गाड़ी झटके खाकर बंद हो सकती है या इंजन के पुर्जों में जंग लग सकता है.

माइलेज का गणित – आपकी जेब पर कितनी चपत?

सरकार कहती है कि सोशल मीडिया पर 30% माइलेज गिरने का दावा झूठा है. सरकार यहां सही है 30% माइलेज नहीं गिरता, लेकिन माइलेज गिरता ज़रूर है और इसके सरकारी सबूत मौजूद हैं.  

  • ऊर्जा की कमी: एथेनॉल में पेट्रोल के मुकाबले कम ताकत (Calorific Value) होती है, इसलिए उतने ही लीटर में गाड़ी कम दूरी तय करती है. 
  • सरकारी रिपोर्ट क्या कहती है: नीति आयोग (2021) की रिपोर्ट साफ कहती है कि जो पुरानी गाड़ियां E0 (जीरो इथेनॉल) के लिए बनी थीं, उनमें E20 डालने पर फ्यूल एफिशिएंसी 6 से 7 प्रतिशत तक गिर सकती है.
  • ऑटो इंडस्ट्री का डेटा: खुद मारुति सुजुकी जैसी कंपनियों ने माना है कि E20 से माइलेज पर 3 से 3.5 प्रतिशत का असर पड़ेगा. 

ब्राजील और अमेरिका ने कैसे किया?

दुनिया के अन्य देशों ने भी एथेनॉल अपनाया है, लेकिन उनका तरीका भारत से अलग रहा. 

  • ब्राजील: वहां भी पेट्रोल में ज्यादा एथेनॉल होता है, लेकिन वहां बिकने वाली 80% नई कारें ‘फ्लेक्स फ्यूल’ – Flex Fuel होती हैं यानी वो किसी भी तरह का पेट्रोल झेल सकती हैं. वहां सरकार पंपों पर सब्सिडी देती है, ताकि माइलेज घटने की भरपाई हो सके और ग्राहक चुन सकता है कि उसे क्या डलवाना है.
  • भारत की संभावित चूक: रफ्तार बहुत तेज रखी. आम जनता को चुनने का विकल्प नहीं दिया, पंप पर कोई लेबलिंग नहीं की कि आप क्या खरीद रहे हैं और कीमत में भी कोई छूट नहीं दी.

बड़े सवाल, जिन पर अब भी पर्दा 

पेट्रोल पंपों के अंडरग्राउंड टैंकों की हालत: देश में 90 हजार से ज्यादा पंप हैं. E20 स्टोर करने के लिए पंपों के पुराने टैंकों की सफाई और लाइनिंग बदलना जरूरी है, लेकिन आज तक इसका कोई स्वतंत्र ऑडिट पब्लिक नहीं हुआ कि असल में जमीनी स्तर पर कितने पंप सुरक्षित रूप से अपग्रेड हुए हैं.

सरकार का यह दावा एकदम सही है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग से देश का बहुत फायदा हुआ है. भारत ने कच्चा तेल आयात करने में करीब 2 लाख करोड़ रुपये बचाए हैं, पर्यावरण को थोड़ा फायदा हुआ है और पैसा सीधे किसानों (गन्ना मिलों) तक पहुंचा है.

आज भी एक तबके का मानना है कि इस पूरी नीति में सारा ‘त्याग’ सिर्फ आम उपभोक्ता कर रहा है. रेसिंग कारों का उदाहरण देकर यह नहीं कहा जा सकता कि करोड़ों पुरानी गाड़ियों की इंजन लाइफ खतरे में है, माइलेज घट रहा है और सबसे बड़ी बात – देश के नागरिकों से उनके ईंधन चुनने का अधिकार पूरी तरह छीन लिया गया है.

ये भी पढ़ें: 1 लीटर में 35 KM माइलेज, मारुति ला रही सबसे फ्यूल एफिशिएंट कार



Source link