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Hirni Birni Folk Dance Of Bihar: बिहार का नाम सुनते ही कई लोगों के दिमाग में भोजपुरी गाने, फिल्मी धुनें और ऑर्केस्ट्रा के कार्यक्रम आने लगते हैं. लेकिन इस राज्य की सांस्कृतिक पहचान इससे कहीं ज्यादा समृद्ध है. यहां ऐसे लोक नृत्य भी हैं, जिनमें सिर्फ संगीत और मनोरंजन नहीं, बल्कि प्रेम, संघर्ष और सामाजिक भेदभाव की कहानियां भी सुनाई जाती हैं. ऐसा ही एक लोक नृत्य है हिरनी-बिरनी, जो दो नटिन बहनों की कहानी पर आधारित है.

अंग क्षेत्र में प्रचलित इस लोक नृत्य की खासियत यह है कि इसमें कलाकार केवल नाचते नहीं हैं, बल्कि अपने अभिनय और हाव-भाव से पूरी कहानी को मंच पर उतारते हैं. गीतों की लय के साथ आगे बढ़ती यह प्रस्तुति समाज की उन बंदिशों को भी सामने लाती है, जिनका सामना अलग-अलग जातियों के लोगों को करना पड़ता था. इसलिए हिरनी-बिरनी को महज एक डांस समझना इसकी असली पहचान को नजरअंदाज करना होगा.

दो बहनों के नाम पर पड़ा हिरनी-बिरनी नृत्य का नाम

हिरनी-बिरनी नृत्य के पीछे दो नटिन बहनों की दिलचस्प लोककथा है. कहानी के मुताबिक, हिरनी और बिरनी बेहद सुंदर और चतुर थीं. उनके पास मोहन नाम का एक विशाल और ताकतवर भैंसा था, जिसे काबू में करना आसान नहीं था. दोनों बहनों ने अपने विवाह के लिए एक अनोखी शर्त रखी थी. उनका कहना था कि जो भी वीर उनके भैंसे को नाथने में सफल होगा, वे उसी से विवाह करेंगी.

Hirni Birni Dance: दो नटिनी की कहानी है बिहार का यह डांस, गलती से ऑर्केस्टा न समझना

यह चुनौती आसान नहीं थी. कई अखाड़ों के पहलवानों ने मोहन को काबू करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली. आखिरकार बावनगढ़ अखाड़े के पोसन सिंह ने इस चुनौती को स्वीकार किया और भैंसे को नाथ दिया. इस तरह वह दोनों बहनों की शर्त पूरी करने में सफल रहा और लोककथा के अनुसार, हिरनी-बिरनी का विवाह पोसन सिंह से हो गया. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. असली संघर्ष तो इसके बाद शुरू होता है.

प्रेम के रास्ते में आ गई जाति की दीवार

लोककथा में पोसन सिंह को ऊंची जाति का बताया गया है, जबकि हिरनी और बिरनी नट जाति से थीं. अलग-अलग जातियों के बीच विवाह को लेकर समाज की सोच ऐसी थी कि इस रिश्ते को आसानी से स्वीकार नहीं किया गया. पोसन सिंह को अपने परिवार और समाज के बहिष्कार का सामना करना पड़ा.

हिरनी-बिरनी की कहानी में इसी टकराव को गीतों और अभिनय के माध्यम से दिखाया जाता है. एक तरफ प्रेम और वैवाहिक जीवन है, तो दूसरी तरफ सामाजिक नियम और जातिगत भेदभाव. कलाकार इन परिस्थितियों को अपने संवाद, हाव-भाव और नृत्य के जरिए सामने लाते हैं. कहानी में पोसन सिंह और दोनों बहनों के संघर्ष के साथ समाज में दोबारा अपनी जगह बनाने की कोशिश को भी दिखाया जाता है. यही वजह है कि इस लोक नृत्य में मनोरंजन के साथ सामाजिक जीवन की झलक भी देखने को मिलती है.

Hirni Birni Dance: दो नटिनी की कहानी है बिहार का यह डांस, गलती से ऑर्केस्टा न समझना

पीढ़ियों से चली आ रही है लोक नृत्य की परंपरा

हिरनी-बिरनी नृत्य का संबंध बिहार की नट समुदाय की लोक परंपरा से बताया जाता है. इसकी कहानी लिखित ग्रंथों के बजाय मुख्य रूप से मौखिक परंपरा के जरिए आगे बढ़ती रही है. एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचने वाली ऐसी लोककथाएं स्थानीय समाज के अनुभवों और मान्यताओं को अपने भीतर समेटे रहती हैं. गांवों में गीत और नृत्य के माध्यम से प्रेम, विवाह, जातिगत भेदभाव और पारिवारिक रिश्तों से जुड़ी परिस्थितियों को पेश किया जाता था. समय के साथ हिरनी-बिरनी की कथा भी लोक प्रस्तुति का हिस्सा बनी रही. इसके गीतों में स्थानीय जीवन की भाषा और भावनाएं सुनाई देती हैं, जिससे दर्शक कहानी से आसानी से जुड़ पाते हैं.

गीत, अभिनय और पारंपरिक वाद्य यंत्र हैं इसकी पहचान

हिरनी-बिरनी नृत्य में अंगिका और क्षेत्रीय बोलियों का खास महत्व है. कलाकार गीतों के जरिए कहानी को आगे बढ़ाते हैं, जबकि नर्तक अपने हाव-भाव और शारीरिक गतिविधियों से पात्रों की भावनाएं दिखाते हैं. इससे प्रस्तुति सिर्फ नृत्य तक सीमित नहीं रहती, बल्कि लोक नाटक का रूप ले लेती है. इसमें पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन भी अहम होती है. ढोलक, झाल और मंजीरा जैसे वाद्य यंत्रों की ताल पर कलाकार नृत्य और अभिनय करते हैं. महिला कलाकार हिरनी और बिरनी की भूमिका निभाने के लिए रंग-बिरंगे पारंपरिक कपड़े पहनती हैं, जबकि पुरुष कलाकार ग्रामीण वेशभूषा में नजर आते हैं. मुख्य गायक गीतों के जरिए कहानी सुनाते हैं और कलाकार उसे अपने प्रदर्शन से जीवंत बनाते हैं.

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ऑर्केस्ट्रा से अलग है बिहार के इस नृत्य की पहचान

हिरनी-बिरनी को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि इसकी असली ताकत केवल संगीत या कलाकारों के नाचने में नहीं है. इसके केंद्र में एक लोककथा है, जिसमें दो बहनों के जीवन, विवाह और सामाजिक संघर्ष को दिखाया जाता है. गीत, अभिनय और नृत्य मिलकर इस कहानी को आगे बढ़ाते हैं. बिहार की सांस्कृतिक विरासत में ऐसे लोक नृत्य स्थानीय समुदायों के इतिहास और अनुभवों को सहेजने का काम करते हैं. हिरनी-बिरनी भी इसी परंपरा का हिस्सा है. 

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