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Indigenous Cow Breeds: अगर आप भी पशु फार्मिंग करने का सोच रहे हैं तो ये पांच गाय आपके लिए बेहद फायदेमंद हो सकती हैं, जो दूध देने के मामले में भैंसों को कड़ी टक्कर देती हैं. ये 5 देसी नस्लें हैं- साहीवाल, गिर, थारपारकर, लाल सिंधी और कांकरेज गाय. ये नस्लें रोजाना 10 से 20 लीटर तक दूध देती हैं और इनके A2 दूध को सेहत के लिए अच्छा माना जाता है. साथ ही, ये देसी नस्ल की गायें स्थानीय मौसम में आसानी से ढल जाती हैं और इनकी देखभाल भी आसान होती है. इनमें रोगों से लड़ने की क्षमता भी बेहतर मानी जाती है.

साहीवाल गाय

साहीवाल गाय भारत और पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र की एक प्रसिद्ध देसी नस्ल है. यह अपने अच्छे दूध उत्पादन, गर्मी सहने की क्षमता और मजबूत शरीर के लिए जानी जाती है. इसका रंग आमतौर पर गहरा लाल या भूरा होता है और शरीर भारी व मजबूत होता है. साहीवाल गाय को ‘लोला’ भी कहा जाता है, क्योंकि इसकी त्वचा ढीली और लचीली होती है. यह गाय रोजाना करीब 10 से 16 लीटर या उससे अधिक दूध दे सकती है और इसके दूध में लगभग 4.8 से 5 प्रतिशत तक फैट पाया जाता है. इसके दूध को A2 दूध के रूप में भी जाना जाता है. साथ ही, यह नस्ल मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए भी प्रसिद्ध है और गर्म मौसम में आसानी से रह सकती है.

गिर और थारपारकर गाय

गिर गाय राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र में पाई जाती है. इसका शरीर लाल रंग का होता है, जिस पर सफेद धब्बे दिखाई देते हैं. इसका सिर गुंबद के आकार का और कान लंबे होते हैं. यह गाय एक ब्यांत में औसतन 2,110 लीटर दूध दे सकती है. इन गायों को पालते समय शेड में साफ हवा और पानी की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए. पशुओं की संख्या के अनुसार भोजन के लिए पर्याप्त जगह भी रखें. वहीं, थारपारकर नस्ल पश्चिमी पाकिस्तान के थारपारकर जिले से जुड़ी है और भारत में मुख्य रूप से जोधपुर, कच्छ और जैसलमेर में पाई जाती है. इसे ग्रे सिंधी, व्हाइट सिंधी और थारी नामों से भी जाना जाता है. इसका शरीर राख जैसा रंग लिए होता है, सिर चौड़ा और सींग वीणा के आकार के होते हैं. इसकी टांगें छोटी और पतली, पूंछ लंबी तथा कूबड़ बड़ा और चौड़ा होता है. यह गाय करीब 1,400 लीटर दूध देती है. यह एक मिश्रित नस्ल मानी जाती है और इसके बैल खेती के काम के लिए अच्छे माने जाते हैं.

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लाल सिंधी और कांकरेज गाय

लाल सिंधी और कांकरेज भारत-पाकिस्तान क्षेत्र की प्रसिद्ध देसी गायों की नस्लें हैं. लाल सिंधी पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र से उत्पन्न दुधारू नस्ल है, जिसे मलिर, रेड कराची और सिंधी के नाम से भी जाना जाता है. यह गर्मी सहने की क्षमता के लिए प्रसिद्ध है और एक लैक्टेशन में करीब 1,100 से 2,600 किलो दूध दे सकती है, जिसमें लगभग 4 से 5.2 प्रतिशत फैट होता है. वहीं, कांकरेज भारत की मजबूत और भारी देसी नस्लों में शामिल है, जो मुख्य रूप से गुजरात और राजस्थान में पाई जाती है. इसका शरीर मजबूत, सींग घुमावदार और कूबड़ बड़ा होता है. यह रोजाना करीब 5 से 10 लीटर दूध दे सकती है और इसके बैल खेती व ढुलाई के कामों के लिए बेहद उपयोगी माने जाते हैं. दोनों नस्लें गर्मी सहने और रोगों से लड़ने की अच्छी क्षमता के लिए जानी जाती हैं.

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