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Tukaram Munde, Food Safety: महाराष्ट्र में फूड-सेफ्टी को लेकर FDA कमिश्नर तुकाराम मुंडे की कार्रवाई इन दिनों चर्चा में है. इसी बीच  ट्विंकल खन्ना ने अपने हालिया ‘मिसेज फनीबोन्स’ कॉलम के जरिए इस पूरे मामले पर चुटकी ली. उन्होंने फूड बिजनेस पर हो रही कार्रवाई को अपनी रसोई से जोड़ते हुए मजाकिया अंदाज में बताया कि मुंडे के अभियान से प्रभावित होकर उन्होंने घर में भी ‘छापेमारी’ करने का फैसला किया.

ट्विंकल ने लिखा कि अपनी रसोई की जांच के दौरान उन्हें ‘शाही मसाला’ का एक पुराना पैकेट मिला. उन्होंने इसकी एक्सपायरी डेट को लेकर व्यंग्य करते हुए लिखा कि ऐसा लगा जैसे वह “मुगल साम्राज्य के समय” का हो. इसी मजाक के जरिए उन्होंने मुगल इतिहास और उससे जुड़े खानपान को लेकर चल रही बहस पर भी तंज कसा. उन्होंने सवालिया अंदाज में कहा कि अगर इतिहास की किताबों से मुगलों के प्रभाव को हटाने की कोशिश की जा रही है, तो फिर उनके दौर से जुड़ी मानी जाने वाली चीजों को लेकर भी सवाल उठना चाहिए. इसी सिलसिले में उन्होंने कोफ्ते, कोरमा और कबाब जैसे लोकप्रिय व्यंजनों का जिक्र किया.

मुगलई खाने की जड़ें उन शाही रसोइयों से जुड़ी मानी जाती हैं, जहां भारतीय उपमहाद्वीप पर 16वीं सदी की शुरुआत से लेकर 19वीं सदी के मध्य तक शासन करने वाले मुगल बादशाहों के लिए खाना तैयार किया जाता था. मध्य एशिया से आए मुगल अपने साथ फ़ारसी, तुर्की और अफगान खानपान की परंपराएं भी लेकर आए. जब इन परंपराओं का मेल भारत की समृद्ध मसाला संस्कृति से हुआ, तो एक ऐसी पाक शैली विकसित हुई, जिसे आज मुगलई खाना कहा जाता है. मुगल वंश के संस्थापक बादशाह बाबर के बारे में कहा जाता है कि भारत आने के बाद यहां के खाने की सादगी से वह बहुत प्रभावित नहीं हुए थे. इसके बाद वह फारसी रसोइयों को अपने साथ लेकर आए, जिन्होंने मध्य एशियाई पकाने की तकनीकों को भारतीय सामग्री और मसालों के साथ मिलाना शुरू किया. इसी मेल को मुगलई खानपान की शुरुआती नींव माना जाता है.

Mughlai Cuisine: क्या कोरमा और कबाब मुगलों ने बनाया था? जानिए दावों का पूरा सच

शाहजहां और औरंगजेब के दौर में शाही खानपान

शाहजहां और औरंगजेब के शासनकाल में मुगलई खानपान अपने चरम पर पहुंचा. शाही रसोइयों में सैकड़ों रसोइए काम करते थे और अलग-अलग लोग खास व्यंजनों को तैयार करने में माहिर होते थे. इसी दौर में बिरयानी, कोरमा, निहारी और कबाब जैसे व्यंजनों को खास पहचान मिली और उन्हें बेहतर तरीके से तैयार किया गया. मुगलई खानपान में धीमी आंच पर खाना पकाने की तकनीक का भी खास महत्व रहा. दम पुख्त में बर्तन को अच्छी तरह बंद करके कम आंच पर खाना पकाया जाता है, जिससे सामग्री के स्वाद धीरे-धीरे विकसित होते हैं. वहीं तंदूर में पकाने की परंपरा ने तंदूरी रोटी, नान और तंदूरी चिकन जैसे व्यंजनों को पहचान दी. अलग-अलग मसालों को सही अनुपात में मिलाकर गहरे और कई परतों वाले स्वाद तैयार करना भी इस पाक शैली की खासियत रही.

कबाब

mughlaimagic के अनुसार, कबाब को मुगलई खानपान की एक खास पहचान माना जाता है. मुगल दरबारों की रसोई में भुने और आग पर पकाए गए मांस पर खास जोर दिया जाता था. आमतौर पर मांस को मसालों के साथ तैयार करके आराम से पकाया जाता, ताकि आग उसका स्वाद और खुशबू उभार सके. आगे चलकर भारतीय उपमहाद्वीप में इस शैली के कई रूप विकसित हुए. सीख कबाब से लेकर लखनऊ की बेहद नरम और मुंह में घुल जाने वाली कबाब की किस्मों तक, इसकी कई अलग-अलग शैलियां सामने आईं.

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हालांकि, इंटरनेट पर यह भी दावा किया जाता है कि आग पर भुने जाने वाले मांस के सीख वाले व्यंजन मुगल साम्राज्य से काफी पहले से मौजूद थे. यह भी कहा जाता है कि दिल्ली सल्तनत के दौर में ही साधारण कबाब भारत में सदियों पहले पहुंच चुके थे. मुगलों ने इसको बेहतर किया. 

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कोरमा

कोरमा शाही खानपान से जुड़ा एक गाढ़ा और मलाईदार व्यंजन है, जिसे आमतौर पर दही, क्रीम, पिसे हुए मेवों और मसालों के साथ तैयार किया जाता है. इसे धीमी आंच पर पकाया जाता है, ताकि मांस और मसालों का स्वाद धीरे-धीरे विकसित हो. इसकी खासियत तेज स्वाद के बजाय ऐसा स्वाद है, जो खाने के बाद भी धीरे-धीरे बना रहता है. इंटरनेट पर तमाम जगहों पर ये दावा किया जाता है कि इसकी मुगल इसको लेकर नहीं आए. शुरुआती मुगल रिकॉर्ड्स में ‘आइन-ए-अकबरी’ का नाम भी सामने आता है, लेकिन इसमें आज के समय में खाए जाने वाले क्रीमी कोरमा का जिक्र नहीं मिलता. बाद में भारतीय शाही रसोइयों ने पतले फारसी शोरबों को स्थानीय पिसे हुए मेवों, केसर और भारतीय मसालों के साथ मिलाया. इसी प्रक्रिया के दौरान वह गाढ़ी, मेवेदार और दही पर आधारित ग्रेवी विकसित हुई, जिसे आज कोरमा के तौर पर जाना जाता है.

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