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सुबह के करीब साढ़े सात बजे थे… गुरुग्राम की गोल्फ कोर्स रोड पर बाइक राइडर सिया अपनी स्पोर्ट्स बाइक पर सवार थी. पीछे उसके बाइकिंग ग्रुप के दोस्त थे. तभी एक सफेद मारुति सियाज उसका पीछा करने लगी. कार में बैठे लोगों ने उसे रुकने का इशारा किया, सिया ने मना किया. फिर कार ने उसे टक्कर मार दी. सिया सड़क पर गिरी, बाइक कई मीटर तक घिसटती चली गई और कार वहां से हो गई फरार. 13 सितंबर 2026 को हुई इस घटना के आरोपी कल्याण बैंसला को दो दिन बाद राजस्थान के दौसा से गिरफ्तार किया गया. पुलिस ने पहले रैश ड्राइविंग की धारा में केस दर्ज किया था, बाद में हत्या के प्रयास की धारा 109 जोड़ी गई. यह सिर्फ एक हिट एंड रन केस नहीं है. यह हमारे समाज की उन कमियों का आईना है, जिन्हें हम रोज देखकर नजरअंदाज कर देते हैं…

गुरुग्राम की घटना समाज की 5 बड़ी कमियां उजागर करके 1 कड़वा सवाल छोड़ जाती है…

कमी-1: महिलाओं के लिए सड़कें अब भी सुरक्षित नहीं

सिया ने खुद कहा कि उसे सिर्फ इसलिए टारगेट किया गया क्योंकि वह महिला बाइकर है. यह कोई अकेली घटना नहीं है.

NARI 2025 रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की शहरी महिलाओं में से 40% खुद को ‘नॉट सो सेफ’ या ‘असुरक्षित’ महसूस करती हैं. यह सर्वे 31 शहरों की 12,770 महिलाओं पर किया गया था. सिर्फ 22% महिलाओं ने ही हेरेसमेंट की शिकायत दर्ज कराई और सिर्फ 16% मामलों में कार्रवाई हुई.

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 7% महिलाओं ने 2024 में सार्वजनिक जगहों पर हेरेसमेंट का सामना किया, लेकिन 24 साल से कम उम्र की महिलाओं में यह आंकड़ा दोगुना यानी 14% हो जाता है. पड़ोस (38%) और पब्लिक ट्रांसपोर्ट (29%) हेरेसमेंट के सबसे आम ठिकाने हैं.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, बेंगलुरु में महिलाओं के खिलाफ अपमानजनक हमले के 897 मामले दर्ज हुए. यह दिल्ली (755) और मुंबई (857) से भी ज्यादा हैं. बेंगलुरु का क्राइम रेट 22.1 है, जो दिल्ली के 10.0 और मुंबई के 10.1 से दोगुने से भी ज्यादा है.

यानी जब एक महिला सड़क पर निकलती है, तो उसे सिर्फ ट्रैफिक से नहीं, बल्कि उस मानसिकता से भी लड़ना पड़ता है जो उसे ‘अलग’ नजर से देखती है.

कमी-2: कानून का डर लोगों में नहीं

हिट एंड रन केसों में सजा मिलने की दर इतनी कम है कि लोगों में डर ही नहीं बचा.

मिनिस्ट्री ऑफ रोड ट्रांसपोर्ट एंड हाइवेज (MoRTH) और NCRB के आंकड़ों के मुताबिक, हिट एंड रन में मौतें 2013 के 18,702 से बढ़कर 2023 में 31,209 हो गईं. यानी 10 साल में करीब 67% की बढ़ोतरी हुई. कुल सड़क मौतों में हिट एंड रन का हिस्सा 13-14% से बढ़कर करीब 18% हो गया है.

2022 में देशभर में 47,806 हिट एंड रन केस दर्ज हुए. इनमें 50,815 लोग पीड़ित थे. MoRTH के मुताबिक, उस साल हिट एंड रन में 30,486 लोगों की मौत हुई.

सबसे बड़ी समस्या सजा की दर है. नेग्लिजेंट ड्राइविंग केसों में कन्विक्शन रेट 50% से भी नीचे है और 90% से ज्यादा केस अब भी अदालतों में लंबित हैं. बेंगलुरु की बात करें तो 2021 से 2025 के मिडिल तक 3,500 से ज्यादा घातक हादसे हुए, लेकिन कन्विक्शन रेट सिर्फ 7% रहा. 2025 में जून तक सिर्फ 4 कन्विक्शंस दर्ज हुए. अधिकारियों का मानना है कि 70% तक घातक मामले आरोपी और पीड़ित परिवार के बीच प्राइवेट सेटलमेंट में निपट जाते हैं.

2024 में देशभर में 8 करोड़ से ज्यादा चालान काटे गए, जिनकी कीमत 12 हजार करोड़ रुपए थी. इसमें से 75% यानी करीब 9 हजार करोड़ रुपए का भुगतान ही नहीं हुआ. यानी जुर्माना कागजों में है, डर जमीन पर नहीं.

कमी-3: हादसे के बाद कोई मदद क्यों नहीं करता?

जब सिया सड़क पर गिरी, तो उसके दोस्तों ने मदद की. हर पीड़ित इतना किस्मत वाला नहीं होता.

भारत में हादसे के बाद लोग मदद करने से कतराते हैं. सेवलाइफ फाउंडेशन और TNS इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की नेशनल स्टडी के मुताबिक, 2013 में 4 में से 3 भारतीय हादसे के शिकार लोगों की मदद करने से हिचकिचाते थे. 77% लोगों ने कहा कि उन्हें अस्पताल में बेवजह डिटेंशन और रजिस्ट्रेशन चार्ज भरने का डर रहता है. 2018 तक यह अनिच्छा घटकर 62% हुई, लेकिन फिर भी बहुत ज्यादा है.

एक और स्टडी में पाया गया कि महिलाएं खून देखकर सबसे ज्यादा घबराती हैं. कानूनी उलझनों का डर लोगों को मदद करने से रोकता है. रिसर्च में साफ कहा गया है कि जब तक पुलिस रिफॉर्म नहीं होगा और लोगों का कानूनी सिस्टम पर भरोसा नहीं बनेगा, तब तक लोग मदद करने से डरते रहेंगे.

गुड समैरिटन लॉ 2019 में आया, जो हादसे में मदद करने वालों को कानूनी सुरक्षा देता है. हालांकि, जमीन पर लोगों को इसकी जानकारी ही नहीं है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) की स्टडी के मुताबिक, GSL के बाद मदद करने की इच्छा बढ़ी है और कानूनी डर घटा है, लेकिन असली बदलाव के लिए जागरूकता और ट्रेनिंग की सख्त जरूरत है.

सड़क पर मौत का सबसे बड़ा कारण समय पर मदद न मिलना है. लॉ कमीशन ऑफ इंडिया का अनुमान है कि भारत में 50% सड़क मौतें सिर्फ समय पर मेडिकल केयर मिलने से रोकी जा सकती हैं.

कमी-4: कानून बनते हैं, लागू नहीं होते

2019 में मोटर व्हीकल्स अमेंडमेंट एक्ट आया. इसमें हिट एंड रन में मौत पर मुआवजा 25 हजार रुपए से बढ़ाकर 2 लाख रुपए किया गया. गंभीर चोट पर 12,500 रुपए से 50,000 रुपए किया गया. गोल्डन आवर में मुफ्त इलाज की बात कही गई. मोटर व्हीकल एक्सीडेंट फंड बनाने की बात कही गई, जो बिना बीमा वाले वाहनों और हिट एंड रन केसों में मुआवजा देगा.

2023 में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार ने अब तक इसके नियम ही नहीं बनाए. कोर्ट ने केंद्र को 6 महीने का समय दिया कि वह इस लॉ को लागू करे.

नतीजतन, 80 हजार करोड़ के मोटर एक्सीडेंट क्लेम अदालतों में फंसे हैं. 10.46 लाख से ज्यादा केस लंबित हैं. मुआवजा मिलने में औसतन 3.6 साल लगते हैं और कुछ मामलों में 10 साल से भी ज्यादा. 90% पेंडिंग हिट एंड रन क्लेम सिर्फ डॉक्युमेंटेशन की कमी की वजह से अटके हैं.

हर साल करीब 25,000 लोग हिट एंड रन में मारे जाते हैं, लेकिन FY23 में सिर्फ 205 क्लेम ही दाखिल हुए. FY24 में यह बढ़कर 3 हजार हुए, फिर भी यह बहुत कम है. यानी कानून कागजों में मजबूत है, लेकिन जमीन पर पीड़ित को न्याय मिलने में सालों लग जाते हैं.

कमी-5: गुरुग्राम में सड़कें सबसे ज्यादा खतरनाक

यह घटना गोल्फ कोर्स रोड पर हुई. यह गुरुग्राम की उन पांच सड़कों में से एक है जहां सबसे ज्यादा मौतें होती हैं.

2025 के ट्रैफिक पुलिस डेटा के मुताबिक, NH-48, द्वारका एक्सप्रेसवे, KMP एक्सप्रेसवे, सोहना एलिवेटेड रोड और गोल्फ कोर्स रोड पर 401 हादसे हुए और 200 लोगों की मौत हुई. NH-48 पर सबसे ज्यादा 127 मौतें हुईं.

गुरुग्राम में 2025 में कुल 1,115 हादसे हुए, जिनमें 472 लोगों की मौत हुई और 770 लोग गंभीर रूप से घायल हुए. 2024 में 1,024 हादसों में 478 मौतें हुई थीं. हादसे बढ़ रहे हैं और मौतें कम नहीं हो रहीं.

पूरे हरियाणा की बात करें तो 2025 में 6,480 हादसे हुए और 3,059 लोगों की मौत हुई. गुरुग्राम इस लिस्ट में 330 मौतें और 805 हादसों के साथ टॉप पर है.

क्या समाज में सुधार के लिए किसी घटना का वायरल होना जरूरी है?

जब कोई घटना वायरल होती है, तो पुलिस फौरन हरकत में आती है. आरोपी की गिरफ्तारी होती है. धाराएं बदली जाती हैं. नेता बयान देते हैं. प्रशासन जांच कमेटी बैठाता है. मीडिया लगातार फॉलो करता है और पीड़ित को कुछ हद तक न्याय मिलने की उम्मीद बनती है.

सबसे बड़ी समस्या यह है कि वायरल होना एक लॉटरी बन गया है. जो केस वायरल हो गया, उसमें कार्रवाई हो गई. जो वायरल नहीं हुआ, वह फाइलों में दबा रह गया.

एक्सपर्ट्स कहते हैं कि सुधार के लिए पुलिस को वायरल के बिना काम करना होगा. पुलिस को FIR दर्ज करनी पड़े, चाहे वीडियो वायरल हो या न हो. कोर्ट को तय समय में सजा देनी पड़े. सरकार को सड़क इंजीनियरिंग सुधारनी पड़े. स्पीड कैमरे, सर्विस लेन, फुटपाथ, स्ट्रीट लाइट, ट्रैफिक पुलिस की ट्रेनिंग और भ्रष्टाचार पर लगाम जरूरी है.

सिया बच गई, लेकिन हर बार कोई सिया नहीं बचती. हर बार कोई वीडियो वायरल नहीं होता और हर बार पुलिस खुद केस दर्ज नहीं करती.





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