पंजाब में विधानसभा चुनाव की तैयारी के साथ ही राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीति को तेज करना शुरू कर दिया है. राज्य में चुनावी तस्वीर सिर्फ एक मुद्दे से तय नहीं होगी. पंजाब के अलग-अलग हिस्सों में मतदाताओं की प्राथमिकताएं और स्थानीय समस्याएं अलग हैं. यही वजह है कि राजनीतिक दल मालवा, माझा और दोआबा के लिए अलग-अलग रणनीति तैयार करने में जुटे हैं.
हर पार्टी की कोशिश विधानसभा में बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने की है. राज्य के चुनाव में कुछ मुद्दे पूरे पंजाब में समान रह सकते हैं, लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर किसान, बेरोजगारी, नशा, सीमा सुरक्षा, दलित वोट और एनआरआई जैसे मुद्दों का असर अलग-अलग दिखाई दे सकता है.
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मालवा में किसान और किसानी सबसे बड़ा फोकस
मालवा पंजाब का सबसे बड़ा चुनावी क्षेत्र है. यहां विधानसभा की 69 सीटें आती हैं और यह इलाका 15 जिलों में फैला हुआ है. पंजाब की राजनीति में मालवा की भूमिका इसलिए भी अहम है क्योंकि यहां के चुनावी रुझान अक्सर पूरे राज्य की तस्वीर पर असर डालते हैं.
2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने मालवा की 69 में से 66 सीटों पर जीत दर्ज की थी. कांग्रेस को दो और शिरोमणि अकाली दल को एक सीट मिली थी. इस बार सभी दलों के लिए मालवा में अपना आधार मजबूत करना बड़ी चुनौती होगी.
किसानों से जुड़े सवाल, खेती की लागत, भूजल का गिरता स्तर, कैंसर प्रभावित इलाकों की समस्या, रोजगार और युवाओं का दूसरे राज्यों या विदेश की ओर जाना चुनावी चर्चा में जगह बना सकता है.
आम आदमी पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री अमन अरोड़ा का कहना है कि 2022 में पार्टी के पास दिल्ली मॉडल को बताने के लिए था, लेकिन इस बार सरकार पंजाब में किए गए काम को अपने विकास मॉडल के तौर पर जनता के सामने रखेगी.
माझा में नशा और सीमा से जुड़े मुद्दे अहम
माझा क्षेत्र में अमृतसर, गुरदासपुर, तरनतारन और पठानकोट जिले आते हैं. यहां कुल 25 विधानसभा सीटें हैं. पाकिस्तान से लगी सीमा के कारण इस इलाके में चुनावी मुद्दों का स्वरूप भी कुछ अलग रहता है. 2022 में आप ने माझा की 25 में से 16 सीटों पर जीत हासिल की थी. कांग्रेस को सात सीटें मिली थीं, जबकि शिअद और भाजपा के खाते में एक-एक सीट गई थी.
आने वाले चुनाव में नशे की समस्या, सीमा पार से होने वाली तस्करी, सीमावर्ती किसानों की दिक्कतें और व्यापार से जुड़े सवाल महत्वपूर्ण रह सकते हैं. वहीं अमृतसर और पठानकोट जैसे शहरी इलाकों में स्थानीय विकास और रोजगार के मुद्दों पर भी दलों का फोकस रहेगा.
दोआबा में दलित और एनआरआई वोट पर नजर
जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला और नवांशहर को मिलाकर बना दोआबा क्षेत्र 23 विधानसभा सीटों वाला इलाका है. यहां दलित और एनआरआई मतदाताओं की भूमिका राजनीतिक दलों के लिए काफी अहम मानी जाती है.
2022 में आप ने 10 सीटें जीती थीं. कांग्रेस को नौ सीटें मिलीं, जबकि भाजपा ने दो सीटों पर जीत दर्ज की थी. शिअद और बसपा के खाते में एक-एक सीट गई थी.
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इस बार दोआबा में दलित मतदाताओं से जुड़े सवाल, विदेश जाने की बढ़ती प्रवृत्ति, एनआरआई से जुड़े मुद्दे, अवैध खनन, उद्योग और स्थानीय विकास जैसे विषय चुनावी बहस का हिस्सा बन सकते हैं.
कुल मिलाकर पंजाब का चुनावी मुकाबला सिर्फ राज्यव्यापी मुद्दों तक सीमित रहने के बजाय अलग-अलग क्षेत्रों की स्थानीय जरूरतों के आधार पर भी आकार ले सकता है. यही वजह है कि राजनीतिक दलों की नजर अब तीनों क्षेत्रों के अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों पर है.