एशियाई खेलों में भारतीय महिला हॉकी टीम ने 44 साल बाद स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया. इस ऐतिहासिक जीत का हिस्सा सोनीपत की शिल्पी डबास भी रहीं. बेटी की इस उपलब्धि से परिवार में खुशी का माहौल है.
शिल्पी की मां अनीता ने बताया कि एशियाई खेलों में जब भी भारतीय टीम का मुकाबला होता था, वह मैच देखने के बजाय भगवान के सामने बैठकर भारत की जीत की प्रार्थना करती थीं. अब बेटी के स्वर्ण पदक जीतने पर उनकी खुशी का ठिकाना नहीं है.
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माता-पिता को देखकर शुरू किया हॉकी का सफर
शिल्पी ने हॉकी का सफर अपने माता-पिता को देखकर शुरू किया. जब परिवार चंडीगढ़ में रहता था, तब उनके पिता अनिल डबास हॉकी खेलते थे. मां अनीता भी राष्ट्रीय स्तर की हॉकी खिलाड़ी रही हैं. माता-पिता को मैदान पर खेलते देखकर शिल्पी के मन में भी हॉकी के प्रति लगाव पैदा हुआ. छठी कक्षा में उन्होंने हॉकी स्टिक थाम ली और इसके बाद लगातार मेहनत करती रहीं.
पिता हॉकी के नेशनल खिलाड़ी रहे
पिता अनिल डबास अपने समय के राष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी रहे हैं. खेल प्रदर्शन के आधार पर उन्हें केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल में नौकरी मिली थी. अब वह सेवानिवृत्त हैं. उन्होंने बताया कि शिल्पी में बचपन से ही हॉकी का जुनून था. वह तडक़े चार बजे उठकर मैदान में अभ्यास करने चली जाती थीं.
2013 से शुरू किया सफर
वर्ष 2013 में राष्ट्रीय जूनियर प्रतियोगिता से उन्होंने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन शुरू किया और कई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पहचान बनाई. शिल्पी ने जूनियर और वरिष्ठ राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन किया है. वर्ष 2021 की राष्ट्रीय जूनियर हॉकी प्रतियोगिता में उन्हें प्रतियोगिता की सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुना गया था. वह जूनियर भारतीय हॉकी शिविर का भी हिस्सा रह चुकी हैं. अब महिला हॉकी लीग में उन्हें शरांची रार बंगाल टाइगर्स ने दो लाख रुपये में टीम में शामिल किया है.
पिनाना गांव निवासी शिल्पी के मामा आशीष मलिक ने कहा कि भारत की जीत के दौरान मुकाबला देखते हुए पूरा परिवार रोमांचित था. उनकी बहन अनीता और बहनोई अनिल दोनों हॉकी खेलते थे. माता-पिता को देखकर उनके बेटे और बेटी ने भी हॉकी को अपनाया. उन्होंने कहा कि शिल्पी की उपलब्धि पर पूरे परिवार को गर्व है.
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